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भारतीय शिक्षा प्रणाली में डिजिटलाइजेशन और तकनीकी सुधारों को हमेशा से एक प्रगतिशील कदम माना गया है। इसी दिशा में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने कक्षा 12वीं की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के लिए ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) यानी डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली को अपनाया था। लेकिन, जो तकनीक पारदर्शिता और सटीकता बढ़ाने के लिए लाई गई थी, वह इस साल विवादों के केंद्र में आ गई है। छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों की गंभीर शिकायतों के बाद अब यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच चुका है।
इस पूरे सीबीएसई ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) विवाद की जांच के लिए केंद्र सरकार द्वारा गठित उच्चस्तरीय समिति आगामी 27 अगस्त को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपने जा रही है। क्षमता निर्माण आयोग की अध्यक्ष राधा चौहान की अगुवाई में बनी यह समिति इस बात का खुलासा करेगी कि डिजिटल मूल्यांकन में किस स्तर पर लापरवाही हुई और इसके लिए कौन से अधिकारी जिम्मेदार हैं। माना जा रहा है कि नीट (NEET) पेपर लीक मामले में नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के 47 कर्मचारियों की बर्खास्तगी की तर्ज पर ही सीबीएसई के दोषी अधिकारियों पर भी बड़ी गाज गिर सकती है।
यदि आप भी सीबीएसई बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं या इस प्रणाली से प्रभावित हुए हैं, तो इस पूरे मामले की विस्तृत जानकारी और भविष्य के अपडेट्स के लिए Patamde Study के साथ जुड़े रहें। आइए इस लेख में विस्तार से समझते हैं कि आखिर यह पूरा विवाद क्या है, राधा चौहान समिति की जांच में क्या बिंदु शामिल हैं और 2027 की बोर्ड परीक्षाओं पर इसका क्या असर पड़ेगा।
ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) या डिजिटल इवैल्यूएशन सिस्टम एक ऐसी तकनीक है जिसके तहत छात्रों की भौतिक उत्तर पुस्तिकाओं (Physical Answer Sheets) को पहले उच्च गुणवत्ता वाले स्कैनर्स के माध्यम से स्कैन किया जाता है। इसके बाद इन स्कैन की गई डिजिटल प्रतियों को एक सुरक्षित ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड कर दिया जाता है। शिक्षक अपने घरों या केंद्रीय मूल्यांकन केंद्रों पर कंप्यूटर स्क्रीन के माध्यम से इन डिजिटल कॉपियों की जांच करते हैं और अंकों को सीधे सिस्टम में दर्ज करते हैं।
सीबीएसई ने इस प्रणाली को निम्नलिखित उद्देश्यों के साथ लागू किया था:
इस वर्ष सीबीएसई ने कक्षा 12वीं की लगभग 98 लाख उत्तर पुस्तिकाओं की डिजिटल जांच इसी ओएसएम व्यवस्था के माध्यम से की थी। हालांकि, इतने बड़े पैमाने पर पहली बार लागू की गई इस व्यवस्था में कई गंभीर तकनीकी और प्रशासनिक खामियां उजागर हुईं, जिसने इस पूरी प्रणाली को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया।
सीबीएसई कक्षा 12वीं के परिणाम घोषित होने के बाद से ही देश भर के छात्रों और अभिभावकों में भारी आक्रोश देखने को मिला था। कई मेधावी छात्रों ने शिकायत की कि उन्हें उनकी उम्मीद से बेहद कम अंक मिले हैं। जब छात्रों ने अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की कॉपियां मांगी, तो इस डिजिटल सिस्टम की पोल खुल गई।
मूल्यांकन प्रक्रिया में निम्नलिखित मुख्य गड़बड़ियां सामने आईं:
इन तकनीकी और प्रशासनिक खामियों का सीधा असर छात्रों के भविष्य पर पड़ा। कई छात्रों के अंक इतने कम हो गए कि वे विभिन्न विश्वविद्यालयों और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए आवश्यक न्यूनतम पात्रता मानदंड (जैसे 75% अंक) को भी पूरा नहीं कर पाए, भले ही उन्होंने प्रवेश परीक्षाएं पास कर ली थीं। इसी वजह से इस साल कक्षा 12वीं का उत्तीर्ण प्रतिशत पिछले सात वर्षों के निचले स्तर 85.2% पर आ गया।
इस बड़े पैमाने पर हुई गड़बड़ी और चौतरफा विरोध के बाद, केंद्र सरकार ने तुरंत कदम उठाते हुए जून 2026 में सीबीएसई के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल सिंह और सचिव हिमांशु गुप्ता का तबादला कर दिया था। इसके साथ ही, इस पूरे मामले की गहन जांच के लिए एक उच्चस्तरीय एक-सदस्यीय समिति का गठन किया गया।
इस समिति की कमान एस. राधा चौहान को सौंपी गई है। राधा चौहान 1988 बैच की उत्तर प्रदेश कैडर की बेहद सम्मानित और अनुभवी सेवानिवृत्त आईएएस (IAS) अधिकारी हैं। वे भारत सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) में सचिव के पद से सेवानिवृत्त हुई हैं और वर्तमान में क्षमता निर्माण आयोग (Capacity Building Commission) की अध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं। डिजिटल गवर्नेंस और प्रशासनिक सुधारों में उनके व्यापक अनुभव को देखते हुए उन्हें इस संवेदनशील जांच की जिम्मेदारी दी गई है।
राधा चौहान समिति के मुख्य जांच बिंदु निम्नलिखित हैं:
डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली के फायदों और नुकसानों को बेहतर ढंग से समझने के लिए नीचे दी गई तालिका को देखें:
| मापदंड (Parameter) | पारंपरिक मूल्यांकन (Traditional Evaluation) | ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) |
|---|---|---|
| मूल्यांकन का तरीका | शिक्षक भौतिक उत्तर पुस्तिकाओं पर लाल पेन से जांच करते हैं। | शिक्षक कंप्यूटर स्क्रीन पर डिजिटल रूप से स्कैन की गई कॉपियों की जांच करते हैं। |
| अंकों की गणना (Totalling) | अंकों को जोड़ने का काम मैन्युअल होता है, जिससे मानवीय भूल की संभावना रहती है। | कंप्यूटर द्वारा स्वचालित रूप से अंक जोड़े जाते हैं, जिससे गणना की गलतियां नहीं होतीं। |
| तकनीकी निर्भरता | न्यूनतम तकनीकी निर्भरता होती है। | अत्यधिक तकनीकी निर्भरता (हाई-स्पीड स्कैनर, इंटरनेट और सर्वर सुरक्षा)। |
| पारदर्शिता और सुरक्षा | कॉपियों के खोने या फटने का डर रहता है, लेकिन पन्नों के अदल-बदल होने की संभावना कम होती है। | डिजिटल कॉपियां सुरक्षित रहती हैं, लेकिन खराब स्कैनिंग और पन्ने गायब होने का जोखिम रहता है। |
| शिक्षकों का अनुभव | शिक्षक दशकों से इस प्रणाली के आदी हैं, इसलिए किसी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती। | शिक्षकों को कंप्यूटर पर काम करने के लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है, जिसकी इस बार कमी देखी गई। |
हाल ही में नीट (NEET) पेपर लीक मामले में सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए एनटीए के 47 कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया था। इस सख्त कदम से यह स्पष्ट संदेश गया है कि परीक्षाओं की शुचिता और छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।
सीबीएसई के इस मामले में भी सरकार इसी तरह की कड़ी कार्रवाई के मूड में नजर आ रही है। राधा चौहान समिति की रिपोर्ट 27 अगस्त को सरकार को सौंपी जानी है। इस रिपोर्ट के आधार पर लापरवाही के स्तर का निर्धारण किया जाएगा और उन सभी अधिकारियों व बाहरी वेंडर्स (एजेंसियों) पर गाज गिरना तय माना जा रहा है जिन्होंने इस प्रणाली के क्रियान्वयन में कोताही बरती। सूत्रों के अनुसार, इस रिपोर्ट के आने के बाद सीबीएसई के प्रशासनिक ढांचे में कई बड़े और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
छात्रों और अभिभावकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आगामी 2027 की बोर्ड परीक्षाओं में भी उत्तर पुस्तिकाओं की जांच इसी डिजिटल माध्यम से होगी?
राधा चौहान समिति की रिपोर्ट इस सवाल का जवाब देने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। रिपोर्ट में यह तय किया जाएगा कि:
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले पर लगातार नजर बनाए हुए है। कोर्ट ने सीबीएसई को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जब तक इस प्रणाली को पूरी तरह से सुरक्षित नहीं बना लिया जाता, तब तक छात्रों के हितों की रक्षा की जाए और तकनीकी गड़बड़ियों के कारण किसी भी छात्र का शैक्षणिक वर्ष खराब न होने दिया जाए।
सीबीएसई ऑन-स्क्रीन मार्किंग विवाद ने यह साबित कर दिया है कि शिक्षा क्षेत्र में किसी भी नई तकनीक को बिना पर्याप्त तैयारी, परीक्षण और सुरक्षा ऑडिट के लागू करना विनाशकारी साबित हो सकता है। छात्रों की वर्षों की कड़ी मेहनत और उनका करियर केवल कुछ तकनीकी खामियों या प्रशासनिक लापरवाही की भेंट नहीं चढ़ सकता।
27 अगस्त को आने वाली राधा चौहान समिति की रिपोर्ट न केवल दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय करेगी, बल्कि भारत में डिजिटल मूल्यांकन के भविष्य की दिशा भी तय करेगी। उम्मीद है कि सरकार और सीबीएसई इस पूरे प्रकरण से सीख लेते हुए एक ऐसी प्रणाली विकसित करेंगे जो पूरी तरह से सुरक्षित, पारदर्शी और छात्र-अनुकूल हो।
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